नयना के अचानक चले जाने के बाद, समर उस आँगन में देर तक अकेला खड़ा रहा। रात गहरा चुकी थी और रात रानी के फूल पूरी तरह खिलकर अपनी महक बिखेर रहे थे, लेकिन आज उस महक में एक अजीब सी उदासी थी। उस रात नयना बालकनी में नहीं आई। समर घंटों इंतज़ार करता रहा, लेकिन नीचे से कोई आहट नहीं हुई।
अगले दिन सुबह नयना स्कूल के लिए निकली, लेकिन उसने एक बार भी ऊपर बालकनी की तरफ नज़र उठाकर नहीं देखा। उसकी चाल में एक अजीब सी जल्दबाज़ी थी और आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह पूरी रात सोई न हो। समर को अंदर ही अंदर कोई अनहोनी खाए जा रही थी।
रात के करीब दो बज रहे थे। समर अपनी मेज़ पर बैठा था, लेकिन उसकी कलम कागज़ पर एक लफ्ज़ नहीं उकेर पा रही थी। उसका पूरा ध्यान बाहर की खामोशी पर था। तभी उसे नीचे आँगन से किसी के सिसकने की हल्की आवाज़ आई। वह बिना एक पल गँवाए सीढ़ियाँ उतरकर नीचे गया।
चाँद की मद्धम रोशनी में उसने देखा—नयना रात रानी के पौधे के पास ज़मीन पर बैठी थी। उसने अपना सिर घुटनों में छिपा रखा था और उसके कंधे रोने की वजह से काँप रहे थे।
"नयना..." समर ने धीरे से उसके पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखा।
नयना ने एकदम से चेहरा उठाया। उसकी आँखों में बेबसी और गहरा खौफ था। समर को देखते ही वह अपने आँसू नहीं रोक पाई और समर के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। समर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। कुछ देर तक वह बस उसके बालों पर हाथ फेरता रहा, जब तक कि नयना की सिसकियाँ थोड़ी शांत नहीं हो गईं।
"क्या हुआ नयना? कल शाम दादी की आवाज़ के बाद से तुम... मुझे बताओ, मैं सब ठीक कर दूँगा," समर ने उसे दिलासा देते हुए कहा।
नयना ने खुद को समर से थोड़ा अलग किया और अपने आँसू पोंछते हुए भारी आवाज़ में बोली, "कुछ ठीक नहीं हो सकता समर। कल शाम मैं तुम्हें जो सच बताने वाली थी... वह मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा अभिशाप है।"
उसने एक लंबी और सर्द साँस ली और रात रानी के सफेद फूलों को देखते हुए कहना शुरू किया, "यह हवेली... जो तुम्हें इतनी खूबसूरत और ऐतिहासिक लगती है, यह असल में कर्ज़ के एक बहुत बड़े पहाड़ तले दबी है। मेरे पिताजी ने बनारस के एक रसूखदार ज़मींदार से भारी कर्ज़ लिया था और उसे चुकाने से पहले ही वह गुज़र गए। दादी ने इस हवेली को अपने अभिमान की तरह पाला है, इसे बचाने के लिए उन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी लगा दी। लेकिन अब ज़मींदार ने अल्टीमेटम दे दिया है—या तो पैसे चुकाओ, या हवेली नीलाम होगी।"
समर चुपचाप सुन रहा था। उसे लगा कि शायद बात सिर्फ पैसों की है, जिसे वह किसी तरह सुलझा लेगा। लेकिन नयना के अगले शब्दों ने समर के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
"उस ज़मींदार की उम्र मेरी दादी से बस कुछ ही साल कम होगी..." नयना की आवाज़ काँप रही थी, "और दादी ने हवेली और अपने खानदानी गुरूर को बचाने के लिए एक सौदा किया है। अगले महीने की पंद्रह तारीख को, मुझे उस ज़मींदार की तीसरी पत्नी बनकर इस हवेली से विदा होना है।"
"क्या?" समर सन्न रह गया। "यह पागलपन है नयना! तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? यह कोई पुरानी सदी की फिल्म नहीं चल रही है!"
"यही मेरी हकीकत है समर," नयना ने एक दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा। "दिन में मैं एक स्कूल टीचर हूँ, दादी की आज्ञाकारी पोती हूँ, और रात में... मैं बस कुछ पलों के लिए रात रानी के पास वह आज़ाद लड़की बन जाती हूँ जो मैं असल में होना चाहती हूँ। मुझे पता था कि तुम जैसे शहरी और आज़ाद ख्यालों वाले लड़के के लिए यह समझना मुश्किल होगा। इसलिए मैं तुम्हें खुद से दूर रख रही थी। मेरे प्यार का कोई भविष्य नहीं है।"
समर ने नयना के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी आँखों में अब हैरानी की जगह एक अजीब सा जुनून और गुस्सा था।
"मैं एक लेखक हूँ नयना, और मैं अपनी कहानियों का अंत हमेशा खुद तय करता हूँ," समर की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और दृढ़ निश्चय था। "अगर तुम्हारी ज़िंदगी एक कहानी है, तो यकीन मानो, इसका अंत किसी खूसट ज़मींदार की हवेली में घुट-घुट कर नहीं होगा। तुमने कहा था न कि तुम्हें रात से इश्क है? अब मैं तुम्हें इस अंधेरे से निकालकर एक ऐसी सुबह दूँगा, जिसकी महक कभी खत्म नहीं होगी।"
नयना ने समर की आँखों में देखा। उन आँखों में एक ऐसा अटूट भरोसा था जिसने नयना के अंदर सदियों से जमे हुए डर की बर्फ को पल भर के लिए पिघला दिया। लेकिन सवाल यह था कि क्या एक मामूली सा लेखक, बनारस के एक रसूखदार ज़मींदार और पीढ़ियों पुरानी खोखली परंपराओं के खिलाफ लड़ पाएगा?
रात रानी की महक हवा में और तेज़ हो गई थी, जैसे वह भी आने वाले तूफान का संकेत दे रही हो।
(चैप्टर 4 में जारी...)
यहां पढ़ें : रात रानी स्त्री की कहानी - चैप्टर 2