बारिश की वह जादुई रात तो बीत गई, लेकिन समर की आँखों से नयना का वह अक्स नहीं जा रहा था। अगली सुबह जब बनारस के घाटों से मंदिरों की घंटियों की आवाज़ गूँजने लगी, तब समर अपनी बालकनी में खड़ा था। सूरज की तेज़ किरणों में आँगन का वह रात रानी का पौधा अब बिल्कुल आम सा लग रहा था, उसकी वह मदहोश कर देने वाली महक भी धूप में कहीं खो गई थी। समर को नयना की बात याद आई— "दिन की धूप में ये फूल अपनी महक खो देते हैं।"
समर यह देखने के लिए बेचैन था कि क्या दिन के उजाले में सच में सब कुछ बदल जाता है?
सुबह के करीब आठ बज रहे थे। नीचे हवेली का पुराना दरवाज़ा खुला। नयना बाहर आई। रात की उस रहस्यमयी, खुले बालों वाली नयना की जगह आज एक बिल्कुल अलग लड़की खड़ी थी। उसने एक साधारण सा सूती सूट पहना था, बालों की सख्त चोटी गुंथी हुई थी और उसके चेहरे पर घर के कामों और स्कूल पहुँचने की जल्दी की थकान साफ झलक रही थी।
समर ने बालकनी से आवाज़ दी, "सुप्रभात नयना!"
नयना ने चौंककर ऊपर देखा। उसकी आँखों में बीती रात वाली चमक की जगह एक अजीब सी घबराहट थी। उसने सिर्फ हल्का सा सिर हिलाया, नज़रें चुराईं और तेज़ी से हवेली के बाहर निकल गई।
समर को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन उसने खुद से किए उस वादे को याद किया जो उसने नयना से किया था। पूरा दिन समर अपनी किताब के पन्नों पर कम और घड़ी की सुइयों पर ज्यादा ध्यान देता रहा। उसे नयना के स्कूल से लौटने का इंतज़ार था।
शाम के करीब चार बजे जब नयना थकी हारी हवेली लौटी, तो उसने देखा कि आँगन में रात रानी के पौधे के पास एक पुरानी सी कुर्सी पर समर बैठा है। उसके हाथ में चाय के दो कुल्हड़ थे।
नयना ठिठक गई।
"तुम्हें स्कूल से आने में हमेशा इतनी देर होती है क्या?" समर ने मुस्कुराते हुए एक कुल्हड़ उसकी तरफ बढ़ाया।
नयना ने झिझकते हुए चाय ले ली। वह बिना कुछ कहे पास की एक सीढ़ी पर बैठ गई। कुछ देर खामोशी रही, फिर नयना ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "मैंने कहा था ना समर... दिन की रोशनी में सारा जादू खत्म हो जाता है। रात में जो नयना तुम्हें किसी कविता जैसी लगती है, दिन में वह बस एक थकी हुई, आम सी लड़की है, जिसे अपनी बूढ़ी दादी और अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना है। तुम एक लेखक हो, तुम्हें शायद मेरी रात वाली छवि से प्यार हुआ है, इस दिन की सच्चाई से नहीं।"
समर ने अपनी चाय का घूंट लिया और उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "तुमने शायद कल रात मेरी बात ठीक से सुनी नहीं। मैंने कहा था कि अगर तुम साथ हो, तो मेरे हर दिन में भी वही महक होगी। मुझे उस चाँदनी रात वाली नयना से तो इश्क है ही, लेकिन इस धूप में तपी हुई, अपनी ज़िम्मेदारियों से लड़ती हुई नयना के लिए मेरे दिल में बेइंतहा इज़्ज़त है। प्यार सिर्फ चाँदनी रातों में नहीं होता नयना, वह तो तपती दोपहरी में भी सुकून का साया बन जाता है।"
नयना की आँखें भर आईं। वह कुछ कहना चाहती थी, कोई ऐसा बोझ जो उसके सीने में सालों से दबा था। उसने समर की तरफ देखा, "समर, तुम मुझे अभी पूरी तरह नहीं जानते... इस पुरानी हवेली और मेरे बीच एक ऐसा सच है जो..."
इससे पहले कि नयना अपनी बात पूरी कर पाती, अंदर से एक भारी और सख्त आवाज़ गूंजी। "नयना! बाहर किससे बातें कर रही है? और ये चाय की पत्ती किसने बिखेरी है रसोई में?"
यह नयना की दादी की आवाज़ थी। आवाज़ सुनते ही नयना का चेहरा पीला पड़ गया। उसके हाथ से कुल्हड़ छूटते-छूटते बचा।
"मुझे जाना होगा समर," नयना ने घबराहट में कहा और लगभग भागते हुए हवेली के अंदर चली गई।
समर वहीं आँगन में खड़ा रह गया। शाम ढल रही थी और रात रानी के फूल फिर से खिलने को बेताब थे, लेकिन समर के दिमाग में अब एक ही सवाल गूँज रहा था— आखिर नयना का वह सच क्या था? और दादी की उस कड़कती आवाज़ के पीछे का रहस्य क्या है जो नयना को इतना डरा देता है?
(जारी रहेगा...)