जहां सरकार इसे अल्पसंख्यक समुदायों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक उत्थान की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, वहीं आलोचकों ने इन योजनाओं के स्वरूप पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि केवल धर्म के आधार पर ही यह राहत क्यों दी जा रही है? राज्य में कई आर्थिक रूप से कमजोर हिंदू छात्राएं भी उच्च शिक्षा के खर्च से जूझ रही हैं, तो उन्हें इस लाभ से बाहर क्यों रखा गया?
आलोचकों का तर्क है कि यदि सरकार को कल्याणकारी नीतियां बनानी ही थीं, तो उनका मुख्य आधार धार्मिक पहचान के बजाय विशुद्ध रूप से आर्थिक स्थिति होना चाहिए था, ताकि किसी भी वर्ग की जरूरतमंद छात्रा वंचित न रहे। राज्य की राजनीति में बदलाव और नए विजन का दावा कर सत्ता में आए थलपति विजय के इस कदम को कई लोग पारंपरिक तुष्टीकरण और वोटबैंक की पुरानी घिसी-पिटी राजनीति की पुनरावृत्ति करार दे रहे हैं।